महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् (अयि गिरिनन्दिनि): सम्पूर्ण 21 श्लोक, हिंदी अर्थ और पाठ विधि

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् (अयि गिरिनन्दिनि): सम्पूर्ण 21 श्लोक, हिंदी अर्थ और पाठ विधि

सनातन धर्म में शक्ति की अधिष्ठात्री माँ भगवती दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्र, शुक्रवार या दैनिक पूजा के समय माँ के पराक्रम और ममता की स्तुति के लिए महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् (Mahishasura Mardini Stotram) का पाठ सबसे फलदायी और ऊर्जावान माना जाता है।

आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित इस दिव्य स्तोत्र को सामान्य बोलचाल में ‘अयि गिरिनन्दिनि’ के नाम से जाना जाता है। इस स्तोत्र में माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे महादैत्यों के संहार का ओजस्वी वर्णन मिलता है।

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के लाभ

  1. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इसके लयबद्ध और वीर रस से ओतप्रोत श्लोक मन और घर के वातावरण से नकारात्मकता को दूर करते हैं।
  2. भय और संकटों से मुक्ति: नियमित पाठ से मानसिक तनाव, शत्रु बाधा और जीवन के अज्ञात भयों से मुक्ति मिलती है।
  3. आत्मविश्वास में वृद्धि: माँ का उग्र और रक्षक स्वरूप साधक के भीतर साहस, आत्मबल और दृढ़ संकल्प जगाता है।
  4. सुख-समृद्धि की प्राप्ति: माँ जगदम्बा की कृपा से जीवन में ऐश्वर्य, मानसिक शांति और पारिवारिक कल्याण बना रहता है।

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् (सम्पूर्ण २१ श्लोक एवं हिंदी अर्थ)

श्लोक १

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

अर्थ: हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री, पृथ्वी को आनंदित करने वाली, पूरे विश्व को हर्षित रखने वाली और नंदी द्वारा वंदित! हे विंध्याचल के शिखर पर वास करने वाली, भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाली और देवराज इन्द्र द्वारा पूजित! हे नीलकंठ भगवान शिव की अर्धांगिनी, समस्त संसार को अपना परिवार मानने वाली माँ! हे महिषासुर का संहार करने वाली, सुंदर जटाओं से सुशोभित शैलपुत्री, आपकी जय हो।

श्लोक २

सुरवरवर्षिणी दुर्धरधर्षिणी दुर्मुखमर्षिणी हर्षरते त्रिभुवनपोषिणी शङ्करतोषिणी किल्बिषमोषिणी घोषरते । दनुजनिरोषिणी दितिसुतरोषिणी दुर्मदशोषिणी सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अर्थ: हे देवताओं पर वरदानों की वर्षा करने वाली, दुर्धर्ष राक्षसों का दलन करने वाली, दुर्मुख असुर का मर्दन करने वाली और सदैव आनंदमग्न रहने वाली! हे तीनों लोकों का पोषण करने वाली, भगवान शिव को संतुष्ट करने वाली और पापों को हरने वाली माँ! हे दानवों के घमंड को चूर करने वाली, आपकी जय हो।

श्लोक ३

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनी हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनी रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अर्थ: हे जगत की माता, मेरी माँ, कदम्ब के वनों में वास करने वाली और मुख पर मंद मुस्कान धारण करने वाली! हे हिमालय के सर्वोच्च शिखरों के मध्य अपने दिव्य भवन में विराजने वाली! हे मधु-कैटभ नामक महादैत्यों का संहार करने वाली और आनंदमयी माँ, आपकी जय हो।

श्लोक ४

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अर्थ: हे युद्धभूमि में शत्रुओं के शरीरों को सैकड़ों टुकड़ों में काट डालने वाली और शत्रु-हाथियों की सूंड को छिन्न-भिन्न करने वाली! जिनके वाहन सिंह ने अपने प्रचंड पराक्रम से शत्रुओं के हाथियों के मस्तक विदीर्ण कर दिए हैं! हे अपनी भुजाओं के बल से बड़े-बड़े दैत्य सेनापतियों का सिर काटकर गिराने वाली माँ, आपकी जय हो।

श्लोक ५

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते । दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अर्थ: हे युद्ध में उन्मत्त शत्रुओं का वध करने के लिए उद्यत रहने वाली और देवताओं की अजेय शक्ति धारण करने वाली! जिन्होंने चतुर विचारकों में अग्रगण्य भगवान शिव को अपना दूत बनाकर भेजा था! हे दुष्ट विचार वाले दानव दूतों के लिए यमराज स्वरूप माँ, आपकी जय हो।

श्लोक ६

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे । दुमिदुमितामर दुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्निकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अर्थ: हे शरण में आई हुई शत्रु पत्नियों के पतियों को भी अभयदान देने वाली! हे तीनों लोकों को पीड़ा पहुँचाने वाले असुरों के मस्तक को अपने त्रिशूल से छेदने वाली! जिनके विजय पर बजने वाले देव-दुंदुभियों की गूँज से दसों दिशाएँ गूंज उठी हैं, हे माँ, आपकी जय हो।

श्लोक ७

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते । शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

अर्थ: हे केवल अपनी एक हुंकार मात्र से धूम्रलोचन दैत्य को भस्म कर देने वाली! हे रक्तबीज के शरीर से गिरती हर रक्त की बूँद से उत्पन्न असुरों के रक्त को युद्धभूमि में सोख लेने वाली! हे शुंभ और निशुंभ के महायुद्ध में उनके रक्त-मांस से भूत-पिशाचों को तृप्त करने वाली माँ, आपकी जय हो।

श्लोक ८

धनुरनुसङ्ग रणक्षणसङ्ग परिसफुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके । कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

अर्थ: हे धनुष की प्रत्यंचा खींचते समय जिनके अंग-प्रत्यंग युद्ध की गति से नृत्य करते प्रतीत होते हैं! जिनकी स्वर्णिम बाणों से भरी तरकश से निकले बाण शत्रुओं का संहार कर रहे हैं! जिन्होंने युद्धभूमि में शत्रुओं की चतुरंगिणी सेना को तहस-नहस कर दिया, हे माँ, आपकी जय हो।

श्लोक ९

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते । धुधुकुट धुक्कुट धिन्धिमित ध्वनि धीर मृदङ्ग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

अर्थ: हे अप्सराओं के ‘ता-थैई-थैई’ नृत्य अभिनय से प्रसन्न रहने वाली! मृदंग, डमरू और अन्य वाद्यों की ‘कुकुथ-कुकुथ’ और ‘धुधुकुट-धिन्धिमित’ जैसी ताल-ध्वनियों और मंगल गानों में आनंदित रहने वाली माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १०

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते । नटित नटार्ध नटीपटु नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अर्थ: हे ‘जय हो, जय हो’ के जयघोषों और स्तुतियों द्वारा सम्पूर्ण विश्व से वंदित! जिनके पैरों के घुंघरुओं की ‘झम-झम’ झंकार पर भगवान शिव मुग्ध हो जाते हैं! हे अर्धनारीश्वर रूप में नटराज शिव के साथ दिव्य नृत्य में लीन रहने वाली माँ, आपकी जय हो।

श्लोक ११

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहर कान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनीकर वक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

अर्थ: हे अत्यंत पवित्र और सुंदर पुष्पों जैसी मनमोहक कांति से युक्त! जिनका मुखमंडल पूर्णिमा की रात्रि के चंद्रमा के समान शीतल और सौम्य है! जिनके सुंदर नेत्र काले भौंरों की तरह चंचल और आकर्षक हैं, हे माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १२

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लिरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते । शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अर्थ: हे महाबलशाली योद्धाओं और मल्ल युद्ध करने वाले असुरों से युद्ध में रत रहने वाली! वन की लताओं, चमेली के फूलों और वनवासी भील-कन्याओं से घिरी रहने वाली! कोमल और लाल पल्लवों की भांति अत्यंत सुंदर कांति धारण करने वाली माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १३

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्गज राजपते त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते । अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

अर्थ: हे मदमस्त ऐरावत हाथी के समान ऐश्वर्यशाली! तीनों लोकों के आभूषण और चन्द्रमा के समान संपूर्ण कलाओं की निधि और सौंदर्य के सागर रूप पर्वतराज की कन्या! हे सुंदर दंतपंक्ति वाली और कामदेव को भी मोहित कर देने वाले दिव्य रूप से सुशोभित माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १४

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

अर्थ: हे कमल की पंखुड़ियों जैसी निर्मल, कोमल और चंद्रकला से सुशोभित मस्तक वाली! जिनके चलने की गति से हंसों का समूह भी लज्जित हो जाता है! जिनके केशों में लगे नीलकमल और बकुल पुष्पों पर भौंरों के झुंड मंडराते रहते हैं, हे माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १५

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते । निजगणभूत मनोज्ञगुणान्वित द्रविणविदारित शैलसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

अर्थ: हे हाथों में मुरली धारण कर ऐसी मधुर तान छेड़ने वाली जिससे कोयल भी लज्जित हो जाए! भील युवतियों के साथ पर्वतों के निकुंजों में आनंदित विचरने वाली! अपने शिवगणों के साथ पर्वत पर विहार करने वाली हे शैलपुत्री, आपकी जय हो।

श्लोक १६

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयूखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे । जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

अर्थ: हे कमर पर पीले रेशमी वस्त्र धारण करने वाली, जिसकी चमक चंद्रमा की चांदनी को भी फीकी कर देती है! देवताओं और असुरों द्वारा झुककर प्रणाम करते समय उनके मुकुटों की मणियों की चमक से आपके चरण-नख और अधिक चमक उठते हैं, हे माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १७

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते । सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

अर्थ: हे सूर्य के सहस्त्र किरणों के तेज को भी पराजित करने वाली और सहस्रों हाथों से पूजित! तारकासुर के वध के लिए कार्तिकेय (स्कंद) को जन्म देने वाली! राजा सुरथ और समाधि वैश्य की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें परम गति प्रदान करने वाली माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १८

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

अर्थ: हे करुणामयी, हे परम कल्याणमयी शिवे! जो व्यक्ति प्रतिदिन आपके चरणकमलों की सेवा करता है, वह स्वयं लक्ष्मीवान (कमलानिलय) क्यों न हो जाए? और जो केवल आपके चरणों को ही परम पद मानकर ध्यान करता है, उसका कल्याण कैसे न होगा? हे माँ, आपकी जय हो।

श्लोक १९

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

अर्थ: हे माँ! जो सोने के कलशों में भरे सुगंधित तीर्थ-जल से आपके मंदिर और विग्रह का अभिषेक करता है, वह देवराज इंद्र के समान परम ऐश्वर्य और सुख का भोग क्यों न करे? हे देवताओं द्वारा पूजित देवी, मैं आपके कल्याणकारी चरणों की शरण लेता हूँ, आपकी जय हो।

श्लोक २०

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अर्थ: हे माँ! आपका चंद्रमा के समान निर्मल मुखमंडल समस्त पापों और कष्टों को शांत कर देता है। जो आपके इस रूप का ध्यान करता है, क्या उसे स्वर्ग की अप्सराओं के सुख की कोई लालसा रह जाएगी? हे शिवे, आपकी कृपा दृष्टि से क्या कुछ संभव नहीं है, हे माँ, आपकी जय हो।

श्लोक २१

अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते । यदुकृतमत्र ममैव कुरुष्व यथोचितमम्ब कृपां कुरु मे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

अर्थ: हे उमा! आप दीनों पर दया करने वाली हैं, अतः मुझ दीन पर भी अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। हे जगतजननी, आप जिस प्रकार सब पर कृपा करती हैं, उसी प्रकार मुझ पर भी अनुग्रह करें। मैंने जो कुछ भी किया है, उस पर विचार न करते हुए हे माँ, आप जैसा उचित समझें, मुझ पर वैसी कृपा करें। हे महिषासुर का संहार करने वाली शैलपुत्री, आपकी जय हो।

स्तोत्र पाठ के नियम एवं सावधानियाँ

  • शुद्ध उच्चारण: संस्कृत के शब्दों का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध रखें। यदि उच्चारण में कठिनाई हो, तो ऑडियो सुनकर अभ्यास करें या मन ही मन पाठ करें।
  • दिशा एवं आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठकर पाठ करना सर्वोत्तम माना जाता है।
  • दीपक प्रज्वलन: पाठ शुरू करने से पहले माँ दुर्गा के समक्ष गाय के घी या तिल के तेल का दीपक अवश्य प्रज्वलित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र की रचना किसने की थी?

उत्तर: मान्यता के अनुसार इस अद्भुत स्तोत्र की रचना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने की थी।

प्रश्न 2: महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र में कुल कितने श्लोक हैं?

उत्तर: इस संपूर्ण स्तोत्र में कुल 21 श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक ‘जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते’ की टेक के साथ समाप्त होता है।

प्रश्न 3: क्या महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

उत्तर: जी हाँ, कोई भी भक्त शुद्ध मन और पवित्रता के साथ माँ दुर्गा के इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।

नोट – यह सामग्री इंटरनेट से डाउनलोड करके उपलब्ध कराई गई है।

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